उसका और मेरा शहर एक नहीं है,
कभी-कभी तो रोज बात भी नहीं होती,
लेकिन फिर भी न जाने क्यूँ...हर ख़ुशी सबसे पहले उसको सुनाने को मन करता है,
हर दुःख पहले उसको बताने को मन करता है,
उसको लगता है मैं उसको सोचता नहीं,
लेकिन मैं कैसे उसको यह बताऊँ की उसके अलावा कुछ सोचता नहीं,
उसको लगता है की मैं हर महफ़िल में मग्न रहता हूँ ,
लेकिन मुझे महफ़िल में हर जगह वो दिखती है,
अगर वो यहाँ होती तो कैसा होता?
अगर वो वहाँ होती तो कैसा होता?
मुझे महफ़िल में झुमने का वक़्त तब मिले ना
जब मुझे तेरे खयालों से वक़्त मिले,
अक्सर जो हमारे दूर होते हैं,
उन्हें लगता है हम उनके बिना कम्पलीट हैं,
लेकिन नहीं,
हम हर पल हर क्षण उन्हें अपनी महफ़िल में खोज रहे होते हैं,
याद कर रहे होते हैं,
क्योंकि हमारा हर लम्हा उनके बिना अधुरा होता है|
(Copied from Somewhere)